नूह की कश्ती- Shahid Ansari

नूह की कश्ती- Shahid Ansari

नूह की कश्ती- Shahid Ansari

मैं
चादर के एक
हिस्से से जुड़ा,
लटका हुआ हूँ,

आकाश
और पाताल के बीच ।

जहाँ मैं हूँ ,

वहाँ कोई आना
नहीं चाहता,

कपड़े का वो छोटा सा
सिरा जिसके सहारे
मैं टिका हुआ हूँ,

वो टूटेगा
तब
जब उसे नहीं टूटना चाहिए ।

पर मेरे कहने से क्या होता है?

क्या नूह की कश्ती मेरे
कहने से बनी थी?

नहीं ना।

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