एहसास- मिना नाज़ क़ादरी (माही)

एहसास- मिना नाज़ क़ादरी (माही)

एहसास- मिना नाज़ क़ादरी (माही)

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वो लफ़्जो की तिजारत थी और ये दिल कुछ और समझा था
उसे हंसने की आदत थी और ये दिल कुछ और समझा था

मझे उसने कहा आओ नई दुनिया बसाते हैं
उसे सूझी शरारत थी और ये दिल कुछ और समझा था

हमेशा उसकी आंखों में धनक से रंग रहते थे
ये उसकी आम हालत थी और ये दिल कुछ और समझा था

वो मेरे पास बैठा देर तक ग़ज़लें मेरी सुनता
उसे खुद से मोहब्बत थी और ये दिल कुछ और समझा था

मेरे कांधे पे रख कर सर कहीं पर खो गया था वो
ये एक वक़्ती इनायत थी और ये दिल कुछ और समझा था

मिना नाज़ क़ादरी (माही)

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