ख़ुशनसीब थे वो जो इस भंवर से निकल गए- आदिल

ख़ुशनसीब थे वो जो इस भंवर से निकल गए- आदिल

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ख़ुशनसीब थे वो जो इस भंवर से निकल गए
ये वही हैं जो दुनिया की बहर से निकल गए

सफर में निकले हैं तो कहीं तो पहुँचेंगे
यही सोचकर अक्सर हम घर से निकल गए

उन दोनों का सिलसिला मरते मरते मर गया
वो लोग जो एक दूसरे के अंदर से निकल गए

अब जो पलट कर देखता हूँ तो देखता हूँ क्या
कुछ चेहरे अश्कों के साथ नज़र से निकल गए

वक़्त रहते चादर बड़ी करना ज़रूरी है
कहीं ऐसा न हो कि फिर पाँव चादर से निकल गए

आदिल कुछ नहीं, टूटे ख़्वाबों की इमारत है
अच्छा किया जो आप इस खंडहर से निकल गए

~आदिल

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