खिड़की से जो चुपके-चुपके आई थी- Shivam Jha

खिड़की से जो चुपके-चुपके आई थी- Shivam Jha

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

खिड़की से जो चुपके – चुपके आई थी
तुम थी या फिर ठंढी सी पुरवाई थी

बस्ती – बस्ती हुजरा – हुजरा रौशन हैं
तुम थी? या तुम चांद को लेकर आई थी

प्रित लगाई, रीत बताई, राग सुनाई
इश्क़ क्या करती तुम तो खुद हरजाई थी

शब्दों से क्या लिख दू, क्या कुछ कह दू
माशा अल्लाह तेरी क्या रानाई थी

उस रस्ते को छोड़के हम अब पिछे मुड़के लौट गए
आग लगाइ उस बस्ती मे जिसको हमने सजाई थी .
— Shivam Jha

Leave a Reply

Close Menu