माँ- Shivam Jha

माँ- Shivam Jha

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माँ कुछ खाने को दे दो, खांसते हूए बबलू ने अपनी माँ से कहा।
बबलू तीन दिन से बुखार से तरप रहा था ।माँ ने डॉक्टर साहब को बहुत विनती की बबलू के इलाज के लिए लेकिन डॉक्टर साहब इलाज के लिए 200 रुपये माँग रहे थे। माँ ने जो पैसे घरों मे बर्तन माँज के कमाये थे, वो तो सब बबलू के पिताजी ने शराब मे गवा दिए।
माँ करती भी तो क्या करती, बबलू के पिताजी पैसे नही देने पे मारते भी तो हैं।
आज भी बबलू के पिताजी देर रात तक घर से बाहर हैं माँ को चिंता भी हो रही हैं ,लेकिन ये तो उनका प्रतीदिन का काम हैं, रोज ही वो शराब के नशे मे धुत्त हो कर कहीं पड़े रहते हैं,
माँ पता नही क्या सोच रही थी उसने बबलू की आवाज नही सुनी शायद, माँ के आँखो मे आँसु छलक उठे थे।
बबलू ने एक बार और आवाज लगाई माँ कुछ खाने को दो ना, माँ ने सुना शायद इस दफा और कहा अभी लाया बेटा माँ उठी पुराने अखबार मे जो रोटी बचा के रखी थी माँ ने वो रोटी बबलू को दे दिए, ये शायद आखिरी रोटी बची थी जो माँ ने अपने लिए बचा के रखी थी वो, कल भी तो माँ ने कुछ नही खाया था माँ भूखे पेट ही पानी पि के सो गई थी।
माँ ने घड़े मे से पानी निकाला माँ पानी पि रही थी।
बबलू अपना रोटी धीरे धीरे खा रहा था
माँ फिर से किसी गहन सोच मे डूब गई।

—Shivam Jha

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