चालान: रकम ज़रूरी है या उसके पीछे छिपा मकसद?

चालान: रकम ज़रूरी है या उसके पीछे छिपा मकसद?

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उसका 23,000 का चालान कट गया, उसका 55,000 का चालान कट गया, उसका इतने का चालान काट और इसका इतने का चालान कटा। ये सिर्फ खबरें और उपहास का पात्र नहीं है, हमें और आपको इसे समझने की कोशिश करनी होगी।
क्या वो व्यक्ति जिसने ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन किया है और उसपर एक अच्छे खासे चालान की रकम थोपी गयी है वो किसी संवेदना का पात्र होना चाहिये?, हमें ऐसे व्यक्ति से संवेदना दिखाने की क्या ज़रूरत है जिसे अपनी जान के साथ साथ दूसरों के जान की भी परवाह नहीं है। क्या हेलमेट पहन लेने से आप सरकार का कोई भला कर देंगे?, क्या आपके हेलमेट पहने लेने भर से देश की GDP मजबूत हो जाएगी?, रुपया मज़बूत हो जाएगा, मंदी खत्म हो जाएगी, लोगों को नौकरी मिल जाएगी?,

ऐसा कुछ तो होगा नहीं तो होगा क्या?

होगा ये की आप अपने जान के भले के लाइट ना सही कम से कम अपने पैसे बचाने के लिए नियमों का पालन करने लगेंगे। एक छोटी सी कहानी है, मैंने ही बनाई है, बस अभी-अभी-
‘एक व्यक्ति था जिसे नियमों का उल्लंघन करने में मज़ा आता था, ना गाड़ी के कागज़ होते थे उसके पास, न उसके पॉल्युशन का सर्टिफिकेट और तो और वो स्कूटी जिसपर 3 लोगों के बैठने से स्कूटी की जान निकलने लगे उसपर पूरा परिवार बिठा के घूमता और गर्व से कहता कि ‘अरे हमे कोनो काहे टोकेगा?, विधायक जी खास हैं भाई हम’, कोई चालान काट भी नहीं पाता था। एक दिन एक जालिम ब्रेकर ने परिवार के पूरे 6 सदस्यों की जान लील ली, और सबका सर तरबूजा हो गया।’
क्या समझ आया?, क्या उसका 20-30 हजार चालान कटने पर हम उससे सहानुभूति जताते, हमें अब इस मानसिकता से निकलना होगा कि सरकार जो भी करे उसका विरोध करें। आपको खुद को, और अपनी मानसिकता को समझाना होगा कि ‘भैय्या, चालान के डर से ना सही, जान के डर से तो पालन कर लिया जाए’।

-Afzaal Ashraf Kamaal

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