जमाने हुए

जमाने हुए

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नज़र और नज़ारे तो देखा बहुत हैं

तुम्हे ही न देखा ‘जमाने हुए’

ये मुमकिन था अगर खुदा चाह लेते

खुदा ने ना चाहा ‘ जमाने हुए’

कई दौर गुजरी, जमाने हैं गुजरे

गुजरती रही हैं मेरी जिंदगी

रोकर कटी हैं कितनी ही राते

हमे मुस्कराए ‘ जमाने हुए’

फ़कत तेरे आने से रौशन था चेहरा

सजी सी जमीन थी अम्बर सुनहरा

सारी ये बाते पुराने हुए हैं

तुम्हे ही न देखा ‘जमाने हुए’

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