बचपन वाली दिवाली

बचपन वाली दिवाली

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मुझे अब भी याद हैं की हमारी दिवाली की शॉपिंग दशहरे के दिन से ही शुरू हो जाती हैं। (शॉपिंग से मेरा मतलब कपड़े या और कोई भी समान नही हैं वो सब काम घर वालो का होता था) हमारी शॉपिंग मे सिर्फ और सिर्फ पटाखो के लिए स्थान था। रंग बिरंगे पटाखे और कई तरह के बम, फूलझरी और मेरा पसंदीदा गोल गोल घूमने वाला चक्र। पटाखो का नामकरण आमतौर पर उसके ऊपर लिखे हुए ब्रांड के हिसाब से तय था , तरह – तरह के ब्रांड थे और उनके ऊपर चित्र भी ब्रांड के हिसाब से ही लगा होता था, जैसे हनुमान बम के ऊपर अपने पूर्ण स्वरूप मे हनुमान जी विराज होते थे।

एक बात तो मैं भूल ही रहा हूँ हमारे पटाखो की खरीदारी तभी पूरी होती थी जब चुट – चुट आवाज़ करने वाली बन्दुक ले ली जाती थी।उसके बाद हम पटाखो को रोज़ ही सूर्य देव से रुबरू करवाते थे, (लॉजिक ये था की इससे पटाखो की आवाज़ मे बढ़ोतरी हो जाती हैं) और शाम मे जब सूर्य देव अपना बोरिया बिस्तर समट रहे होते थे तब गिनती होती थी पटाखो की ,ये सिलसिला दिवाली के दिन तक मुसलसल चलता था । दिवाली के एक दिन पहले कपड़े से बना हुआ गेंद जिसमे लोहे के लम्बे और पतले तार लगे होते थे (जिसे हम लोग हुक्का लोली के नाम से जानते थे) उसको मिट्टी के तेल मे पूरे दिन भीगाया जाता था। दिवाली के शाम को पटाखे जलाने से पहले हमलोग उस हुक्का लोली मे आग लगाकर अपनी कलाकारी दिखाते थे, एक दम खतरो के खिलारी वाला फील आता था। उसके बाद शुरू होता था अपने – अपने पटाखो के परीक्षण का दौर , लगभग हर पटाखे के बाद हम सब उसके क्वालिटी का रिव्यू करते थे।

खैर अब न वो बचपन रहा न वो मासूम दिवाली, दिल्ली मे बैठकर बस याद कर रहा हूँ वो बचपन की दिवाली। जब जेब मे अट्ठनी हुआ करती थी तो ख्वाब आसमान छुते थे, तम्मनाएं अपनी परवान पर रहती थी। आज जेब मे पैसे भले हो वो चांद सूरज वाले सपने कही खो से गए हैं…

खैर आप सबको पूरे स्याही परिवार के तरफ से दिवाली की आसमान भर शुभकामना।

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