पुण्यतिथि विशेष: अख़्तरी बाई से बेग़म अख्तर बनने की कहानी

पुण्यतिथि विशेष: अख़्तरी बाई से बेग़म अख्तर बनने की कहानी

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आज 30 अक्टूबर है, आज का दिन कई वजहों से याद किया जाता है, प्रमोद महाजन की वजह से याद किया जाता है, होमी जहांगीर भाभा की वजह से याद किया जाता है और भी कई वजहें हैं। आज हम भी 30 अक्टूबर को याद कर रहें है और हम भी कुछ पुराने पन्नों को पलट रहे हैं। आज हम याद कर रहे हैं ऐसी महिला को जिसका ज़िक्र किये बिना ग़ज़ल के सफर को पूरा नहीं माना जा सकता, एक ऐसी महिला की जो ना होती तो उस समय के चोट खाये आशिक़ कहाँ जाते। हम बात कर रहे हैं अख्तरी बाई की जिन्हें आगे चलकर पूरी दुनिया ने बेग़म अख्तर के नाम से जाना। आज बेग़म अख्तर की पुण्यतिथि है। बेगम अख्तर को दादरा और ठुमरी की साम्राज्ञी भी कहा जाता है।

बेग़म अख्तर का जीवन पथरीले रास्तों से भरा था, उन्हें जीवन के हर मुक़ाम पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, 4 साल की उम्र में बहन ने साथ छोड़ दिया, थोड़ी बड़ी हुई तो पिता ने अख्तरी और उनकी माँ को इस ज़ालिम दुनिया से लड़ने के लिए अकेले छोड़ दिया, जब वो थोड़ी और बड़ी हुई और अख़्तरी बाई के नाम से जानी जाने लगी तो बिहार के एक राजा ने कद्रदान बनने के बहाने उनका रेप किया और इस हादसे के बाद मात्र 13 साल की उम्र में अख्तरी प्रेग्नेंट हो गईं और उन्होंने छोटी सी उम्र में बेटी सन्नो उर्फ शमीमा को जन्म दिया। वो दुनिया भर को बताती रही कि सन्नो उनकी बेटी नहीं बल्कि बहन है लेकिन बाद में ये सच्चाई दुनिया के सामने आ गई।

 

अख़्तरी 15 साल की उम्र में पहली बार अख्तरी बाई फैजाबादी के नाम से मंच पर उतरीं और इस मंच पर मौजूद सरोजिनी नायडू को इनके गायन ने प्रभावित किया। बाद में सरोजिनी नायडू ने एक खाड़ी की साड़ी भी अख़्तरी के लिए भिजवाई थी। इसके बाद धीरे-धीरे अख़्तरी ग़ज़लों और मंचों की जान बनती चली गयीं। अख़्तरी ने दाग़, मोमिन और ग़ालिब को खूब गाया। वो कहते हैं ना कि हर रात की एक सुबह होती है, उपरवाले के घर देर है लेकिन अंधेर नहीं, और ऐसे तमाम मुहावरों और लोकोक्तियों को अगर बेग़म अख्तर पर बिठाने की कोशिश की जाए तो शायद बेहद सटीक तरीके से बैठेंगे। एक समय ऐसा भी आया की लोगों में होड़ लगी रहती थी की बस एक बार अख्तरी उनकी ग़ज़ल को अपनी आवाज़ दे दें। ऐसे सैकड़ों किस्से हैं जब शकील बदांयूनी, कैफ़ी आज़मी, फ़िराक़ गोरखपुरी, जिगर मुरादाबादी, शमीम जयपुरी, सुदर्शन फ़ाकिर और कई ग़ज़लकारों ने एक्सक्लुसिवली अख्तरी के लिए ही ग़ज़लों को लिखा और अख़्तरी ने उन्हें अपनी बेहतरीन आवाज़ भी दी।

 

सुदर्शन फ़ाकिर को मशहूर किया बेग़म अख्तर ने-

Sudarshan Faakir
Sudarshan Faakir

‘तबीयत इन दिनों बेगना-ए-गम होती जाती है,

मिरे हिस्से की गोया हर खुशी कम होती जाती है.’

एक बार मंच पर बेग़म अख्तरी जिगर मुरादाबादी की ये पक्तियां गुनगुना रही थीं और दर्शक इन ग़ज़लों में मदहोश हुई जा रही थी तभी पंजाब का एक शायर मंच पर जा पहुंचा और बेग़म से गुज़ारिश की कि ‘आप एक बार मेरी गज़ल गा दें, तो मेरी ज़िंदगी बन जाएगी’ और उस शायर ने एक पर्ची बेग़म अख्तर को थमा दी। उसे बेग़म अख़्तर ने ना ही सिर्फ संगीत से सजाकर सुर दिया बल्कि उस शायर की तारीफ़ में ये भी कहा कि ‘बड़े अच्छे शायर हो, बड़े अच्छे ख्याल हैं और ज़ुबान, माशाअल्लाह़…’ ये शायर कोई और नहीं बल्कि सुदर्शन फ़ाकिर थे। सुदर्शन फाकिर ख़ास तौर पर सिर्फ बेग़म अख्तर के लिए ही लिखते थे। ऐसा कहा जाता है कि सुदर्शन फाकिर ने ये ग़ज़ल बेग़म अख़्तर की ज़िन्दगी पर ही लिखी थी:-

‘कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया,

और कुछ तिल्ख-ए-हायात ने दिल तोड़ दिया.

दिल तो रोता रहा और आंख से आंसू न बहे,

इश्क की ऐसी रिवायत ने दिल तोड़ दिया.’

 

तवायफ नहीं थी अख़्तरी बाई

शुरूआती दौर में जब अख़्तरी बाई ने गायन की दुनिया में कदम रखा था तो लोग उस समय उन्हें तवायफ भी समझते थे। बेगम अख्तर की शिष्या रीता गांगुली ने उन पर एक किताब भी लिखी है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मुंबई के एक तवायफ संगठन ने मुश्तरी बाई से उनकी बेटी को उन्हें सौंपने का अनुरोध किया था। बदले में एक लाख रुपए देने का प्रस्ताव रखा था लेकिन मां मुश्तरी ने इस पेशकश को ठुकरा दिया था।

भारत सरकार ने पद्म श्री और पद्म भूषण से भी नवाज़ा था

बेग़म अख्तर को 1968 में पद्म श्री, 1972 में संगीत नाटक अकादमी अवार्ड और 1975 में मरणोपरांत पद्म भूषण से भी नवाज़ा था। सुर साम्राज्ञी, मल्लिका-ए-ग़ज़ल कही जाने वाली बेग़म अख्तर ने आज ही के दिन 1974 में अपने प्राण त्याग दिए थे।

-Afzaal Ashraf Kamaal

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