साक्षात्कार: एक साथ चार किताबों पर काम कर रहा हूँ: सत्य व्यास

साक्षात्कार: एक साथ चार किताबों पर काम कर रहा हूँ: सत्य व्यास

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(नोट- पिछले दिनों सत्य व्यास दिल्ली में थे, हमारे एडिटर अफ़ज़ाल अशरफ कमाल उनसे मिलने पहुंचे। मकसद था कि हाल ही में आयी उनकी किताब बागी बलियापर थोड़ी बातचीत की जाए, लेकिन जब बातचीत शुरू हुई तो होती ही चली गयी और 1 घंटे लम्बी खिंच गयी। हमने उस फुटेज में से ख़ासम-ख़ास बातें छान के निकाली है। )

 

सत्य व्यास कि लिखीं किताबें
सत्य व्यास कि लिखीं किताबें

 

बनारस टॉकीज, दिल्ली दरबार, चौरासी के बाद सत्य व्यास की नई किताब बागी बलिया के नाम से आयी है। ‘नई वाली हिन्दी’ में लिखने वाले सत्य की इससे पहले आयी तीनों किताबों के फिल्म या वेबसीरीज के लिए कॉपीराइट खरीद लिए गए हैं और जल्द ही आपको सत्य की लिखी किताबों का फ़िल्मी रूप भी देखने को मिलेगा। सत्य ने अपने इस इंटरव्यू में ‘नयी वाली हिन्दी’ से लेकर चेतन भगत तक पर बेबाकी से बोला है। इस इंटरव्यू से पहले हमने अपने पाठकों से भी सवाल मंगाए थे, सत्य ने खुले दिल से उनके जवाब भी दिए। पेश है इंटरव्यू का एक अंश:-

स्याही:- नयी वाली हिन्दी क्या है?

सत्य:- सबसे पहले नयी हिन्दी टर्म का इस्तेमाल भारतेन्दु हरिशन्द्र ने किया था। दरअसल में नयी वाली हिन्दी कुछ और नहीं बल्कि हमारी और आपकी बोलचाल की भाषा है। जिस भाषा में हम बात करते हैं अगर उसे अगर हम किताब में लिख रहे हैं तो दिक्कत क्या है। परम्परागत हिन्दी जिसमें संस्कृत के जटिल और कुटिल शब्द थे, ये उससे अलग है और इसीलिए नयी है।

 

स्याही:- आपकी पहली किताब आयी ‘बनारस टॉकीज, आपने कहा कि ये किताब आपके BHU में हुए निजी अनुभवों पर ही बेस्ड है लेकिन कुछ लोगों की शिकायत है बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में तो रैगिंग नहीं होती है!

सत्य:- जी हाँ, ये बिल्कुल सत्य हैं की बनारस यूनिवर्सिटी मे रैगिंग नही होती है, यह किताब की मांग थी। दरअसल पहले जब यह किताब लिखी तो सम्पादक साहब ने कहा की हॉस्टल लाइफ का जिक्र है, और रैगिंग न हो तो मज़ा नही आएगा, उसके बाद मैंने उसमे रैगिंग वाला भाग डाला। आपको एक बहुत मज़ेदार बात बता दूँ कि सिर्फ रैगिंग वाला पार्ट लिखने मे मुझे पूरे एक साल लग गए। मैं लिखकर भेजता था और मेरे सम्पादक साहब कहते थे ऐसा लिखा जा चुका है या फिर ऐसा पहले हो चुका हैं। अब मेरे दिमाग मे यह नहीं आ रहा था कि नए तरह की रैगिंग कहाँ से लायी जाए। अंततः जब मैंने रैगिंग वाला चैप्टर लिख कर भेजा तो सम्पादक को पसंद आया और किताब के छपने के बाद लोगों ने भी पसंद किया।

सत्य व्यास - द स्याही डॉट कॉम

स्याही:- हॉस्टल वाले चैप्टर से याद आया कि हाल ही में आयी फिल्म ‘छिछोरे’ के बारे में कहा गया कि इसमें हॉस्टल वाला सीन आपकी किताब से ही उठाया गया है, कितना सही आरोप था ये?

सत्य:- मैंने अभी तक वो फिल्म देखी नहीं है। हाँ, कई लोगों ने मुझे अलग-अलग माध्यमों से बताया कि ऐसा कुछ है। नितीश तिवारी अच्छे राइटर हैं, हो सकता है ये उनकी दिमाग की खुद की उपज हो क्यूंकि गर्ल्स हॉस्टल में चोरी के कई वाक़ियात सुनने को मिलते हैं। जब मैंने अपने प्रोडूसर्स से बात की तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, हम उस सीन को बिलकुल अलग तरह से फिल्मा रहे हैं।

 

स्याही:- बलिया की तरफ रुख करते हैं, ‘बाग़ी बलिया’ के किरदार कहाँ से उपजे, क्या संजय और रफ़ीक़ को आपने अपनी कल्पना से इतर व्यक्तिगत जीवन में भी देखा है?

सत्य:- देखिये अफ़ज़ाल, संजय और रफ़ीक़ हर किसी के जीवन में होते हैं, हमें बस उन्हें पहचानने की ज़रुरत है। किरदार के उपजने की जहाँ तक बात है तो मैं कहना चाहूंगा कि मुझे ब्रोमान्टिक टाइप की स्टोरीज बेहद आकर्षित करती हैं। इसमें भी संजय और रफ़ीक़ की मित्रता को ही दिखाया गया है। एक प्रसंग है जो शायद एडिटिंग में कट गया जिसमें संजय रफ़ीक़ से कहता है कि ‘अबे, तुम पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए?’ जवाब में रफ़ीक़ बोल उठता है कि ‘अब्बा तो जा ही रही थी कि तुम्हारी बुआ दिख गयीं तो तय हुआ की निकाह के बाद ही जाएंगे और नहीं जा पाए।’ मैं एक बार फिर यही कहूंगा की हम सबको अपने-अपने संजय और रफ़ीक़ को पहचान लेना चाहिए।

 

स्याही:- किताब लिखते समय दिमाग में क्या चल रहा होता है, क्या ये चीजें लिखते वक्त परेशान कर रही होती हैं कि किताब लोगों को पसंद आएगी या नहीं, किताब बिकेगी या नहीं, बेस्टसेलर होने का भी अपना एक प्रेशर होता है?

सत्य:- 2014 में जब मेरी पहली किताब बनारस टॉकीज आयी थी तो मुझे खुद भी उम्मीद नहीं थी कि लोगों को ये इतना पसंद आएगी। लोगों ने उस किताब को खूब सराहा। जब मैं दूसरी किताब लिख रहा था तो ये दबाव था की लोगों को पहली किताब की सफलता तुक्का न लगे। अब ये थोड़ा कम है क्यूंकि एक सच को हम सब को मानना होगा कि आपकी किताब सिर्फ प्रमोशन के दम पर नहीं बिकेगी। जब तक आपका कंटेंट अच्छा नहीं है आप लाख प्रमोशन कर लें लेकिन जब वो किताब लोगों के हाथ में जायेगी उसे लोग नकार देंगे।

Satya Vyas : सत्य व्यास - thesyaahi.com

स्याही:- चेतन भगत से तुलना होने पर कितना सहज महसूस करते हैं?

सत्य:- इसमें असहज महसूस करने वाली कोई बात ही नहीं है। दिक्कत इस बात से है की लोग या तो ‘हिन्दी का प्रेमचंद’ कहते हैं, या ‘हिन्दी का चेतन भगत’ बोलते हैं, इनके बीच भी हज़ारों अच्छे लेखक आये हैं जिन्हें लोगो ने पढ़ा नहीं है।

 

स्याही:- अगली किताब कौनसी आ रही है?

सत्य:- अफ़ज़ाल मैं एक साथ चार किताबों पर काम कर रहा हूँ। मैं ये नहीं कह सकता कि कौन सी पहले आएगी।

Satya Vyas with Syaahi

स्याही के पाठकों के सवाल

(स्याही के हज़ारों पाठकों के सत्य के लिए सैकड़ों सवाल और शुभकामनाएं आयी थी, सभी को तो हम शामिल नहीं कर सकते थे लेकिन हमने कुछ सवालों को सत्य से पूछा और वो इस तरह हैं:)

शहरों के ही नाम पर किताबो के नाम क्यों?

  • अनुभूती, बनारस

सत्य:- हाहाहा बहुत अच्छा सवाल है अनुभूति का, पहली किताब का नाम शहर के नाम पर रखने की इच्छा नहीं थी, BHU के इर्द-गिर्द नाम रखने की योजना थी पर कोई यूनिक नाम समझ में नहीं आ रहा था। उस दौरान मैं फ़िल्में भी बहुत देखा करता था तो टॉकीज से एक अलग ही रिश्ता था। अंततः नाम ‘बनारस टॉकीज’ पड़ा। ‘दिल्ली दरबार’, दिल्ली के इर्द-गिर्द घूमती हुई कहानी है और दिल्ली मेरे संघर्ष के दिनों का साथी भी रहा है। पहली और दूसरी किताब के बाद चौरासी आयी जो कि किसी शहर के नाम पर नहीं है। ‘बनारस टॉकीज’ और ‘दिल्ली दरबार’ की सफलता के बाद जब बलिया पर किताब लिख रहा था तो इसका नाम शहर के नाम पर जानबूझ कर रखा। इन तीनों शहरों पे मेरा ऋण था, लखनऊ और कोलकाता के ऋण अभी बचे हैं, उन्हें भी उतारना है।

 

जब भी हम ‘नई वाली हिन्दी’ के फॉर्मेट में लिख रहे होते हैं तो एक लॉबी है जो हमारे लिखे हुए को पूरी तरह से नकार देती है। इसे हिन्दी का अपमान बताया जाता है, इनसे कैसे निपटा जाए?

  • सचिन सार्थक, मधुबनी

सत्य:- यह बहुत अच्छा सवाल है, देखिए जब भी आप कुछ नया कर रहे होते हैं तो कुछ लोग होते हैं जो आपको रोकने की कोशिश करते हैं कि यह तुम क्या कर रहे हो, हमारा काम हैं की हम इन लोगो को नज़रअंदाज करते रहे। हम कैसा लिख रहे हैं वह पाठक और आने वाली पीढ़ी खुद तय कर लेगी।

 

हमलोग भाषा की शुद्धता को लेकर इतना रिजिड क्यों हैं, क्या आपको नहीं लगता कि भाषा की प्युरिटी के नाम पर भाषाओं का दम घोंटा जाता रहा है?

  • प्रखर पांडेय ‘आदिल’, गोरखपुर

सत्य:- इस सवाल की ही बात करे तो अफ़ज़ाल इसमे तीन भाषा के शब्द हैं, हिन्दी,इंग्लिश,और फारसी। रिजीडीटी जैसा कुछ नहीं है, समझ-समझ की बात है।

 

नई वाली हिन्दी साहित्य के लिए कितनी फायदेमंद है?

  • अविनाश, दिल्ली

सत्य:- नयी वाली हिन्दी भी साहित्य ही है भाई अविनाश। आपको ऐसा क्यों लगता है की यह साहित्य के लिए फायदेमंद नही हैं। क्या सिर्फ वही हिन्दी हैं जिसमे संस्कृत के शब्द युक्त हो, भाषा का हमेशा से विस्तार होता रहा हैं , इसमे नए शब्द जुड़ते रहे ।

 

What genres does Satya Vyas enjoy writing the most, and where does he gets inspiration from?

  • Kasturi Chaudhuri, DU, Delhi

सत्य:- मुझे ब्रोमान्टिक कहानियां बेहद आकर्षित करती हैं कस्तूरी ।

 

वो जगह जो आपके दिल के सबसे करीब हैं और क्यों?

  • आर्ची आहूजा, अम्बाला

सत्य:- बहुत ही सुंदर सवाल हैं यह, वैसे विदेशो मे मैंने सिर्फ भूटान की यात्रा की हैं और बार-बार वही जाता रहता हूँ। भूटान मुझे बहुत अधिक प्रिय हैं, वहाँ पर मैं एक अलग तरह की शांति महसूस करता हूँ ,जो मुझे अधिक उर्वरक बना देती हैं।

Satya Vyas with Afzaal Ashraf, SYAAHI

(तो ये था सत्य व्यास के साथ स्याही का चौचक इंटरव्यू जिसे हमारे संपादक अफ़ज़ाल अशरफ ने हाल ही में स्याही के लिए दर्ज़ किया। आपको यह इंटरव्यू कैसा लगा जरूर बताईयेगा , आप सत्य को भी अपने शुभ-सन्देश भेज सकते हैं । कुछ भी कहने के लिए आप हमारा इनबॉक्स या कमेंट बॉक्स इस्तेमाल कर सकते हैं । पढ़ते रहिये स्याही और इस इंटरव्यू को अपने साथियों के साथ शेयर करना न भूलियेगा, शुक्रिया ।)

 

This Post Has One Comment

  1. उलझे से सवालों का सुलझा से जवाब ।
    बेहतरीन बातचीत ।।
    शुक्रिया ” स्याही “

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