कुछ पुराने सवाल याद आ गये मुझे,

कुछ पुराने सवाल याद आ गये मुझे,

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कुछ पुराने सवाल याद आ गये मुझे,

जिनके जवाब शायद तब थे मेरे पास.

आज मुड़े-कुचले पन्ने हैं, वो सवाल हैं,

पर जवाब गायब हैं.

जवाब, धुंधले-धुंधले कुछ अस्पष्ट से,

मस्तिष्क-पटल पर शायद अंकित भी हैं,

जो थोड़ा ज़ोर दूं,

तो शायद अस्पष्टता की चादर से बाहर भी आ जाएं,

अपने प्रत्यक्ष रूप में, मेरे सामने खड़े भी हो जाएं,

पर शायद डरता हूँ.

डरता हूँ कि जवाब ही प्रश्न न बन बैठें,

मुझपर, तुमपर, उस वक़्त पर,

जिसे भूल का नाम दे चुके हैं हम.

इन जवाबों को ही तर्क बना पेश किया था आजतक,

मैंने, तुमने , उस बिखरे रिश्ते ने,

जिसे बचपने का नाम दे चुके हैं हम.

ये जवाब ही तो हैं,

जिनसे तुम मुझसे, मैं तुमसे,

जुड़े हुए हैं,,

अकारण ही.

इस अकारण जुड़ाव के कारण ही तो नज़रें मिला लेते हैं आज भी,

मैं, तुम, और हमारा संकोच,

जिसे औपचारिकता से ढँक लेते हैं हम.

इन जवाबों की सौम्यता ही तो है,

जो आज भी हमारी बातों में कठोरता नहीं आने देती,

जो मुझमें, तुममें, हमारी बातों में,

आ आ के रह जाया करती है.

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