याद- मिना नाज़ (माही)

याद- मिना नाज़ (माही)

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मैंने देखा था उन दिनों मे उसे
जब वो खिलते गुलाब जैसा था

उसकी जुल्फों से भीगती थी घटा
उसका रुख़ माहताब जैसा था

लोग पढ़ते थे खाल-आे-खत उसके
वो अदब की किताब जैसा था

अपनी नींदें भी उसकी नज़र हुई
मैंने पाया था रतजगों में उसे

मैंने देखा था उन दिनों में उसे….
मैंने देखा था उन दिनों में उसे….

जब वो हंस हंस के बात करता था
दिल के खेंमें में रात करता था

रंग पड़ते थे आंचलों में उसे
मैंने देखा था उन दिनों में उसे….

ये मगर देर की कहानी है
ये मगर दूर का फसाना है

उसके मेरे मिलाप हायिल
अब तो सदियों भरा ज़माना है

अब तो यूं है हाल अपना भी
दश्त-ए-हिजरा की शाम जैसा है

ना जाने वो इन दिनों कैसा होगा
ना जाने इन दिनों वो कैसा होगा

मैंने देखा था उन दिनों में उसे…
मैंने देखा था उन दिनों में उसे…

मिना नाज़ (माही)

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